ओशो को दर्शनशास्त्री ना कहकर तर्कशास्त्री कहना उपयुक्त रहेगा। ना उनकी कोई राह, न उनका कोई सिद्धांत, बस तर्क से अपनी बात को सही सिद्ध करना मात्र उनका लक्ष्य लगता है। ''आज एक विचार प्रकट किया तो कल अपने ही विचारों को अपनी वाकपटुता से धराशायी करना'' इस उपक्रम को मानसिक व्यायाम कहना कदाचित गलत न होगा। मैं स्वीकार करता हूं कि वो अनुपम प्रतिभा के धनी थे परन्तु प्रतिभावान महान भी हो ये आवश्यक तो नहीं!
महापुरूषों के हृदय में लोकहित समाया रहता है। परन्तु ओशो के कथनानुसार अगर जीवन बनाया जाए तो आत्मा पतन के गर्त में समा जाए। भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण, गुरूनानक, सन्तकबीर, तीर्थकरमहावीर, महात्माबुद्ध, ईसामसीह, मुहम्मद साहिब के अन्य उपदेशों में भले ही यदकिंचित अन्तर हो सकता है परन्तु मन के दमन हेतु सबने ही कहा है। पतान्जली तो मनोनिग्रह को ही योग कहते है। परमात्मा से योग चाहते हो तो मन को नियन्त्रित करों। परन्तु ओशो का राग सबसे अलग ''सम्भोग से समाधि'' वाह-जन्मों से और क्या करता रहा है ये जीव? सूकर-कूकर सभी यही कर रहे है किसकी लगी समाधि?
वासना रूपी आग में जितना घृत डालो आग और भड़केगी, नाकि शान्त होगी! और सुनिए जनाब- 'ओशो' विवाह को समाजिक कुरीति बतातें हैं, तो क्या पशुओं की तरह केवल वासनातुष्टी कर लेना मनुष्य की गरिमा के अनुकूल होगा? हमारी भारतीय संस्कृति में मानव जीवन चार आश्रमों में विभाजित किया गया है। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास । धर्म का पालन तो चारों में ही किया जाता है। ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ, संन्यास आश्रमों में रहने वालों के निर्वाह का प्रबन्ध गृहस्थ ही करता है। इसलिए गृहस्थाश्रम बहुत महत्वपूर्ण है। भारतीय संस्कृति में सदगृहस्थ के रूप में अपने कर्तव्यों और दायित्वों का निर्वहन भली प्रकार करते हुए धर्माचरण करने की परंपरा रही है। कष्टमय संसार में आवागमन से छुटकारा पाने के लिए मोक्ष की कामना की जाती है। ताकि आत्मा का उत्थान हो जाए और वह उस अनंत सत्ता यानी परमात्मा में उसी प्रकार लीन हो जाए जैसे कि संध्या के समय सूर्य की किरणें अस्तांचल में वापस लौट जाती हैं। गृहस्थाश्रम इस प्रक्रिया में बाधक नहीं अपितु सहायक सिध्द हो सकता है। बशर्ते धर्मानुकूल आचरण किया जाए।
''भारतीय संस्कृति या ओशो'' आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें, धन्यवाद!
महापुरूषों के हृदय में लोकहित समाया रहता है। परन्तु ओशो के कथनानुसार अगर जीवन बनाया जाए तो आत्मा पतन के गर्त में समा जाए। भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण, गुरूनानक, सन्तकबीर, तीर्थकरमहावीर, महात्माबुद्ध, ईसामसीह, मुहम्मद साहिब के अन्य उपदेशों में भले ही यदकिंचित अन्तर हो सकता है परन्तु मन के दमन हेतु सबने ही कहा है। पतान्जली तो मनोनिग्रह को ही योग कहते है। परमात्मा से योग चाहते हो तो मन को नियन्त्रित करों। परन्तु ओशो का राग सबसे अलग ''सम्भोग से समाधि'' वाह-जन्मों से और क्या करता रहा है ये जीव? सूकर-कूकर सभी यही कर रहे है किसकी लगी समाधि?
वासना रूपी आग में जितना घृत डालो आग और भड़केगी, नाकि शान्त होगी! और सुनिए जनाब- 'ओशो' विवाह को समाजिक कुरीति बतातें हैं, तो क्या पशुओं की तरह केवल वासनातुष्टी कर लेना मनुष्य की गरिमा के अनुकूल होगा? हमारी भारतीय संस्कृति में मानव जीवन चार आश्रमों में विभाजित किया गया है। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास । धर्म का पालन तो चारों में ही किया जाता है। ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ, संन्यास आश्रमों में रहने वालों के निर्वाह का प्रबन्ध गृहस्थ ही करता है। इसलिए गृहस्थाश्रम बहुत महत्वपूर्ण है। भारतीय संस्कृति में सदगृहस्थ के रूप में अपने कर्तव्यों और दायित्वों का निर्वहन भली प्रकार करते हुए धर्माचरण करने की परंपरा रही है। कष्टमय संसार में आवागमन से छुटकारा पाने के लिए मोक्ष की कामना की जाती है। ताकि आत्मा का उत्थान हो जाए और वह उस अनंत सत्ता यानी परमात्मा में उसी प्रकार लीन हो जाए जैसे कि संध्या के समय सूर्य की किरणें अस्तांचल में वापस लौट जाती हैं। गृहस्थाश्रम इस प्रक्रिया में बाधक नहीं अपितु सहायक सिध्द हो सकता है। बशर्ते धर्मानुकूल आचरण किया जाए।
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